HISAR, 26.01.22-यह मुफ्त मुफ्त के वादे कब बंद होंगे ? यह सवाल मेरा नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट का है सभी राजनीतिक दलों से कि चुनाव में 'फ्री' वादे गंभीर मसला है और इनसे मतदाता बहुत प्रभावित होते हैं । असल में सुप्रीम कोर्ट में ऐसे मुफ्त मुफ्त के वादों के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की गयी है । सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है । स्मरण रहे कि आठ साल पहले भी इस संबंध में गाइडलाइंस बनाने को कहा था पर सिर्फ खानापूर्ति ही हुई ।
चुनावों के दौरान लुभावने वादे करना हर पार्टी की आम बात हो गयी है । सुनहरे दिनों के सपने दिखाना आम हो गया है ।
कभी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया था और वे इस छोटे से दो शब्दों के नारे से चुनाव जीत गयी थीं पर देश से गरीबी हटी नहीं बल्कि और बढ़ गयी और विपक्षी दल जवाब में कहने लगे कि गरीबी हटाओ नहीं यह गरीब मिटाओ नारा है ।
इसी प्रकार हमारी सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने नारा दिया-अच्छे दिन आयेंगे और यदि स्विस बैंकों से अगर काला धन देश में ला पाये तो हर नागरिक के खाते में पंद्रह पंद्रह हजार रुपये आ जायेंगे । अब जिस तरह से सात साल से दिन बीत रहे हैं , जनता कह रही है कि हमारे पुराने दिन ही लौटा दो और पंद्रह हजार रुपये के बारे में विपक्षी दल जनसभाओं में पूछते हैं कि कोई एक व्यक्ति हाथ खड़ा कर बता दे कि उसके खाते में ऐसी कोई राशि जमा हुई हो ? इस तरह इन दिनों ये दो नारे भी चर्चा में हैं ।
कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने किसानों के कर्जे माफ करने के वादे किये और कुछ राज्यों में इस लुभावने वादे से सरकारें आ भी गयीं । अब।भाजपा सवाल उठा रही है कि बताइए कितने किसानों के कर्जे माफ किये गये ?
हरियाणा में वृद्धावस्था पेंशन का नारा दिया था चौ देविलाल ने । पहले तो इसे विरोधियों ने हल्के में लिया लेकिन जब सरकार बन गयी चौ देवीलाल की , फिर तो वृद्धावस्था पेंशन बढ़ाना भी एक वादा हो गया । अभी भाजपा की हरियाणा सरकार ने पत्रकार कल्याण कोश की ओर से सेवानिवृत्त पत्रकारों को दस दस हजार रुपये की पेंशन दी है और हमारे पत्रकार संगठन इसे बीस बीस हजार रुपये करने की मांग सरकार से करने लगे हैं । हो सकता है अगले चुनाव मेअं पत्रकारों की पेंशन भी एक मुद्दा और वादा शामिल है जाये । हरियाणा में कभी बिजली बिल माफ करने का वादा किया गया और कहा कि रहेगा मीटर और न रहेगा बिजली रीडर लेकिन जिस पार्टी ने नारा दिया उसी के कार्यकाल में कंडेला आंदोलन हुआ और फिर पार्टी सत्ता में न आ सकी । कुछ वादे बहुत ही बुरे अंजाम तक पहुंचाते हैं जिनमें से यह एक बड़ा उदाहरण है । तमिलनाडु में अम्मा कैंटीन चली और खूब चली । इसे दूसरे राज्यों ने भी लागू करने की कोशिश की । उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार ने छात्र छात्राओं को साइकिल और लैपटाॅप दिये मुफ्त पर सरकार न बना पाये ।
पंजाब में बिजली के यूनिटों के आधार पर माफी के ऐलान की शुरूआत अरविंद केजरीवाल ने की । फिर दूसरी पार्टियों ने भी इसे अपना लिया लेकिन चौ बंसीलाल सही कहते थे कि बिजली मेरे घरां कोनी बनती , मैं मुफ्त कोन्या देऊं । बिल्कुल सही ।मुफ्त मुफ्त का वादे पूरे हों न हों लेकिन जैसे कोर्ट कह रहा है कि आम जनता को बुरी तरह प्रभावित जरूर करते हैं । रब्ब खैर करे ,,
-पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।
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