चण्डीगढ़, 26.07.26- : आर्य समाज सेक्टर 7-बी में आयोजित रविवारीय साप्ताहिक सत्संग श्रद्धा, भक्ति और वैदिक ज्ञान के वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ आचार्य अमितेश पुरोहित द्वारा वैदिक यज्ञ से हुआ। इसके उपरान्त युवा वैदिक विद्वान सार्थक विद्यार्थी ने अपने ओजस्वी एवं दार्शनिक प्रवचन से उपस्थित श्रद्धालुओं को वैदिक जीवन-दर्शन का मर्म समझाया। अपने उद्बोधन में सार्थक विद्यार्थी ने कहा कि वेद ईश्वर की दिव्य वाणी हैं, जिनमें मानव जीवन को श्रेष्ठ, संतुलित और धर्ममय बनाने का मार्ग प्रशस्त किया गया है। वेदों में परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना और उपासना का वैज्ञानिक स्वरूप वर्णित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूजा का वास्तविक अर्थ कर्म, सत्कार और कर्तव्यपालन है। माता-पिता, गुरु और श्रेष्ठजनों का सम्मान तथा उनकी धर्मानुकूल आज्ञाओं का पालन ही सच्ची पूजा है। उन्होंने कहा कि संसार के सभी साधन केवल विवेकपूर्ण उपभोग के लिए प्राप्त हुए हैं, आसक्ति के लिए नहीं। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने यजुर्वेद का भाष्य कर मानवता को वैदिक ज्ञान का अमूल्य प्रकाश प्रदान किया और यह बताया कि विशुद्ध मन, योग-साधना तथा आत्मानुशासन के माध्यम से ही परमात्मा का साक्षात्कार सम्भव है।

सार्थक विद्यार्थी ने कहा कि परमात्मा एक, अद्वितीय, सर्वव्यापक, अचल और इन्द्रियातीत है। यद्यपि उसे अनेक नामों से पुकारा जाता है, किन्तु उसका स्वरूप एक ही है। उन्होंने कहा कि ईश्वर के दिव्य गुणों का निरन्तर स्मरण और उनका जीवन में अनुकरण करने से मनुष्य के भीतर भी श्रेष्ठ गुणों का विकास होता है। उपासना का वास्तविक अर्थ परमात्मा के समीप होना और अपने जीवन को उसके गुणों के अनुरूप बनाना है। उन्होंने आह्वान किया कि प्रत्येक व्यक्ति वैदिक पद्धति को समझकर जीवन में आत्मसंयम, सत्य, सदाचार और योग का अनुसरण करे, तभी वास्तविक आत्मिक उन्नति सम्भव है।

कार्यक्रम में प्रधान रवीन्द्र तलवाड़, प्रकाश चन्द्र शर्मा, डॉ. विनोद कुमार शर्मा, सुरेश कुमार सहित बड़ी संख्या में आर्यजन उपस्थित रहे।