नूरपुर , 31 अक्तूबर : राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, सभ्यता, संस्कृति और समृद्ध ज्ञान परंपरा का आधार है। वे शनिवार को नूरपुर के समीप मलकवाल स्थित के.बी.वी.एम. इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग में आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय संस्कृत भारती गोष्ठी के शुभारंभ अवसर पर संबोधित कर रहे थे। राज्यपाल ने दीप प्रज्ज्वलित कर गोष्ठी का विधिवत शुभारंभ किया।
इस अवसर पर राज्यपाल ने संस्कृत भारती के पदाधिकारियों, आयोजकों और देशभर से पहुंचे प्रतिभागियों को आयोजन के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों के माध्यम से संस्कृत ने ज्ञान, दर्शन, विज्ञान, नैतिकता और जीवन मूल्यों की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाया है। इसी भाषा ने हजारों वर्षों से भारत की सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखने और पीढ़ियों को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया है।
राज्यपाल ने कहा कि आज का दिन ऐतिहासिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है। देश के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्र उनकी सेवाओं को स्मरण कर रहा है। उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और दूरदर्शी नेतृत्व से लगभग 562 रियासतों का भारतीय संघ में विलय करवाकर देश की एकता और अखंडता को मजबूत आधार प्रदान किया। जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के संदर्भ में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। उनका योगदान राष्ट्र निर्माण के इतिहास में सदैव स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेगा।
इस अवसर पर राष्ट्रीय एकता दिवस के उपलक्ष्य में उपस्थित लोगों को राष्ट्रीय एकता की शपथ भी दिलाई गई।
राज्यपाल ने कहा कि भारत के इतिहास का अध्ययन केवल साम्राज्यों और विदेशी आक्रमणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमारी शिक्षा व्यवस्था में प्राचीन भारतीय ऋषियों, विद्वानों, वैज्ञानिकों और ज्ञान परंपराओं को भी उचित स्थान मिलना चाहिए। आर्यभट्ट, पाणिनि, सुश्रुत और भास्कराचार्य जैसे महान विद्वानों का योगदान विश्व के ज्ञान-विज्ञान को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण रहा है।
उन्होंने कहा कि तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय भारत की गौरवशाली शैक्षणिक परंपरा के प्रतीक हैं, जहां देश-विदेश से विद्यार्थी ज्ञान अर्जित करने आते थे। नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत की संपूर्ण एवं संतुलित जानकारी मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मातृभाषाओं को जीवित रखने के लिए उनका दैनिक जीवन में प्रयोग आवश्यक है। यदि हम अपने घरों और परिवारों में ही अपनी मातृभाषा का उपयोग नहीं करेंगे, तो उनका संरक्षण और संवर्धन संभव नहीं होगा।
उन्होंने संस्कृत भारती के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि संस्था संस्कृत को जनसामान्य तक पहुंचाने और इसे दैनिक व्यवहार की भाषा बनाने के लिए सराहनीय कार्य कर रही है। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालयों की स्थापना, संस्कृत अध्ययन एवं अनुसंधान को प्रोत्साहन तथा प्राचीन पांडुलिपियों का संरक्षण भी इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं।
राज्यपाल ने कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए प्राचीन ज्ञान परंपराओं को आधुनिक तकनीक, अनुसंधान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीक से जोड़ना आवश्यक है। संस्कृत साहित्य में गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद और अन्य विषयों से संबंधित महत्वपूर्ण ज्ञान उपलब्ध है। इस ज्ञान पर प्रमाणिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शोध कर इसे विश्व के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
राज्यपाल ने कहा कि
हिमाचल प्रदेश को ऋषि-मुनियों की तपस्या, प्राचीन मंदिरों और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं की भूमि है, प्रदेश की स्थानीय बोलियों में संस्कृत के अनेक शब्द और भाषाई प्रभाव देखने को मिलते हैं। चंबा के भरमौर क्षेत्र की गद्दी बोली और जम्मू-कश्मीर की कश्मीरी भाषा में भी संस्कृत का गहरा प्रभाव है। चंबा क्षेत्र के प्राचीन अभिलेख और टांकरी लिपि में संरक्षित सामग्री हमारी समृद्ध भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।
उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2019 में संस्कृत को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया। अब विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को संस्कृत के अध्ययन, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना चाहिए।
राज्यपाल ने युवाओं से आह्वान किया कि वे संस्कृत को केवल परीक्षा का विषय न समझें, बल्कि इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान के अमूल्य भंडार के रूप में अपनाएं। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारती का प्रयास होना चाहिए कि प्रत्येक विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में संस्कृत के प्रति रुचि पैदा की जाए तथा विद्यार्थियों को इसके अध्ययन के लिए प्रेरित किया जाए।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। दोनों के समन्वय से ही विकसित भारत के संकल्प को साकार किया जा सकता है। हमें संस्कृत की महान ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने के साथ-साथ इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प लेना होगा।
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने कहा कि अखिल भारतीय गोष्ठी केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की विविधता में एकता का जीवंत प्रमाण है। उनका विश्वास है कि यह आयोजन विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद और परस्पर सम्मान स्थापित करेगा तथा समाज में भाईचारे और प्रेम की भावना को मजबूत करेगा।
इस अवसर पर संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष रमेश कुमार पांडेय, अखिल भारतीय महामंत्री सत्यनारायण भट्ट, प्रांत अध्यक्ष डॉ. राजेश शर्मा, हिमाचल प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री एवं स्वागत समिति के अध्यक्ष राकेश पठानिया तथा पूर्व विधायक भटियात विक्रम जरियाल सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।