चण्डीगढ़ : चण्डीगढ़ संगीत नाटक अकादमी (सीएसएनए) के सहयोग से संस्कार भारती, पंजाब प्रांत एवं संवाद थिएटर ग्रुप द्वारा गढ़वाल रामलीला एवं दशहरा मंडल, सेक्टर 28-बी, चंडीगढ़ के मंच पर एक दिवसीय श्रीरामलीला का भावपूर्ण मंचन किया गया। लगभग ढाई घंटे की इस प्रस्तुति में श्रीराम के वनवास से लेकर चित्रकूट की ऐतिहासिक धर्मसभा तक की कथा को कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय, सशक्त संवादों और संवेदनशील मंचन के माध्यम से जीवंत कर दिया। भाईचारे, त्याग, कर्तव्य, पारिवारिक मूल्यों और धर्म की मर्यादा का ऐसा भावपूर्ण चित्रण हुआ कि दर्शक भावविभोर हो उठे और कई लोगों की आंखें नम हो गईं।
प्रस्तुति में दिखाया गया कि किस प्रकार मंथरा के बहकावे में आकर कैकेयी राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांगती हैं। एक वरदान के तहत श्रीराम के लिए 14 वर्षों का वनवास और दूसरे के तहत भरत के लिए अयोध्या का राज मांग लिया जाता है। पिता की आज्ञा और रघुकुल की मर्यादा का पालन करते हुए प्रभु श्रीराम सहर्ष वन जाने का निर्णय लेते हैं। उनके साथ माता सीता और लक्ष्मण भी वन की ओर प्रस्थान करते हैं। इस प्रसंग में श्रीराम का धैर्य, सीता का समर्पण, लक्ष्मण की भ्रातृभक्ति और राजा दशरथ की पुत्र-वियोग से उपजी पीड़ा को कलाकारों ने अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया।
नाटक का सबसे प्रभावशाली और विचारोत्तेजक प्रसंग चित्रकूट की धर्मसभा रहा, जहां श्रीराम और भरत के बीच राज्य के अधिकार और कर्तव्य को लेकर संवाद होता है। श्रीराम चाहते हैं कि भरत अयोध्या का राज संभालें, जबकि भरत का आग्रह होता है कि श्रीराम ही अयोध्या के वास्तविक राजा हैं और उन्हें लौटकर राज्य की जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। दोनों भाइयों के तर्कों में सत्ता की लालसा नहीं, बल्कि कर्तव्य, त्याग और एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम दिखाई देता है।
धर्मसभा में ऋषिराज जनक निर्णायक की भूमिका में उपस्थित होते हैं। सभी पक्षों को सुनने के बाद वे श्रीराम के वनवास में रहकर पिता की आज्ञा का पालन करने के पक्ष में निर्णय देते हैं। अंततः भरत प्रभु श्रीराम की चरण-पादुकाएं लेकर अयोध्या लौटने का निर्णय लेते हैं। यह दृश्य भारतीय संस्कृति में भ्रातृप्रेम, त्याग और धर्मपालन की महान परंपरा का सशक्त संदेश देता है।
प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाने के लिए प्रोफेशनल लाइटिंग, साउंड और एलईडी वॉल का उपयोग किया गया। प्रकाश व्यवस्था की डिजाइनिंग एवं संचालन राजेश कुमार ने किया। आधुनिक तकनीकी संसाधनों और सटीक प्रकाश संयोजन ने दृश्यों के भावनात्मक प्रभाव को और अधिक सशक्त बनाया।
संवाद थिएटर ग्रुप की इस प्रस्तुति ने संदेश दिया कि सच्चा धर्म केवल अधिकार प्राप्त करने में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य का पालन करने, त्याग की भावना रखने और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने में है। श्रीराम और भरत के आदर्श आज भी समाज को मर्यादा, पारिवारिक एकता, निस्वार्थ प्रेम और नैतिक मूल्यों के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।