सफलता की कहानी-लुधियाणा तक पहुंचने लगी धनेटा क्षेत्र के गांव कुसियार की मौसम्बी
8 हैक्टेयर बंजर भूमि पर एचपीशिवा परियोजना की मदद से लहलहा रहा बागीचा
इस सीजन मेें मोहिंद्र कुमार को है लगभग 70 क्विंटल पैदावार की उम्मीद

हमीरपुर 18 अक्तूबर। हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्रों में फल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा आरंभ की गई एचपीशिवा परियोजना के बहुत ही अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। इन क्षेत्रों की खेती योग्य उपजाऊ भूमि ही नहीं बल्कि, वर्षों से बंजर पड़ी जमीन पर भी अब एचपीशिवा परियोजना के कारण मौसम्बी, अमरूद और अन्य फलों के बागीचे लहलहाने लगे हैं।

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के गृह क्षेत्र धनेटा के गांव कुसियार में भी कई वर्षों से बंजर पड़ी लगभग 8 हैक्टेयर भूमि पर अब एचपीशिवा परियोजना की मदद से मौसम्बी का बागीचा तैयार हो चुका है। यहां लगाए गए लगभग साढे सात हजार पौधों में से लगभग 1100 पौधों से इस बार पहली फसल भी आ चुकी है। जबकि, अन्य छोटे पौधों में भी फसल के शुरुआती सैंपल आने शुरू हो गए हैं।
इस सीजन में पहली भरपूर फसल आने पर गांव के बागवान काफी गदगद हैं। उनके बागीचे की मौसम्बी अब स्थानीय बाजारों के अलावा पंजाब के लुधियाणा और जालंधर जैसे बडे़ शहरों तक भी पहुंचने लगी है।

कुसियार के प्रगतिशील बागवान मोहिंद्र कुमार ने बताया कि गांव में कई बीघे जमीन लंबे समय से खाली एवं बंजर पड़ी हुई थी। कई वर्षों से खेती न होने के कारण इस जमीन में झाड़ियों के अलावा कुछ भी नहीं था।

लेकिन, प्रदेश सरकार की एचपीशिवा परियोजना के अंतर्गत आने के बाद तो इस जमीन और इसके मालिकों की तो मानों तकदीर ही बदल गई। बागवानी विभाग के अधिकारियों ने गांववासियों को यहां एचपीशिवा परियोजना के तहत मौसम्बी का बागीचा लगवाने के लिए प्रेरित किया। सर्वप्रथम, विभाग ने इस जमीन से झाड़ियां हटवाने और इसे समतल करवाने की व्यवस्था करवाई। लगभग 8 हैक्टेयर भूमि पर गड्ढे बनाने से लेकर पौधारोपण तक का कार्य भी विभाग ने करवाया। देखते ही देखते इस गांव में मौसम्बी के पौधे लहलहाने लगे।

मोहिंद्र कुमार ने बताया कि उन्हांेने मौसम्बी के लगभग 1100 पौधे लगाए हैं। इनमें से कुछ पौधांे में पिछले सीजन में ही सैंपल आने शुरू हो गए थे और उन्होंने लगभग 30 क्विंटल मौसम्बी बेचकर लगभग एक लाख रुपये की आय अर्जित की थी। इस बार उन्हें लगभग 70 क्विंटल पैदावार की उम्मीद है। अभी तक वह लगभग 60 क्विंटल मौसम्बी का तुड़ान कर चुके हैं। इसे स्थानीय बाजारों के अलावा पंजाब के लुधियाणा, जालंधर और अन्य शहरों की मंडियों में भी भेजा जा रहा है। इससे उन्हें दो लाख रुपये से अधिक की आय की उम्मीद है। आने वाले समय में बागीचे के पूरी तरह तैयार होने पर आय में काफी बढ़ोतरी होगी। कुसियार के ही एक अन्य बागवान शक्ति चंद शर्मा ने बताया कि उन्होंने भी पिछले साल ही मौसम्बी के 150 पौधे लगाए हैं।

परियोजना की सराहना करते हुए मोहिंद्र कुमार और शक्ति चंद शर्मा ने बताया कि गांव के बेरोजगार युवाओं के लिए यह परियोजना वरदान साबित हो सकती है। वे नौकरियों के लिए जहां-तहां भटकने के बजाय घर में ही अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं।

उधर, बागवानी विभाग के उपनिदेशक राजेश्वर परमार ने बताया कि कुसियार में एचपीशिवा परियोजना के तहत 8 हैक्टेयर भूमि पर मौसम्बी के लगभग साढे सात हजार पौधे लगाए गए हैं। इनमें से कई पौधों में फसल आनी शुरू हो गई है। विभाग के अधिकारी परियोजना के तहत विभिन्न सुविधाओं और पौधों की देखभाल के बारे में बागवानों का नियमित रूप से मार्गदर्शन कर रहे हैं। जल शक्ति विभाग की सिंचाई योजना के तैयार होने के बाद इस बागीचे के लिए ड्रिप सिंचाई सुविधा भी आरंभ कर दी गई है। यह परियोजना गांव कुसियार के बागवानों की आर्थिकी को सुदृढ़ करेगी।

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सफलता की कहानी-कम भूमि में अधिक आय का बेहतर विकल्प बनी बड़ी इलायची की खेती
बिलासपुर के करोट गांव के प्रेम लाल ठाकुर 20 वर्षों से कर रहे हैं खेती
लगभग एक बीघा में प्रति वर्ष औसतन तैयार कर रहे हैं 2 से 3 क्विंटल बड़ी इलायची
1,800 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल रहे दाम, युवा पीढ़ी को अपनाने का दिया संदेश
प्रदेश सरकार प्राकृतिक तौर पर उत्पादित गेहूं, मक्का, हल्दी व अदरक के लिए दे रही है एमएसपी

बिलासपुर, 18 अक्तूबर: किसानों के लिए पारंपरिक खेती के साथ-साथ कम भूमि में अधिक आय अर्जित करने के लिए वैकल्पिक फसलों को अपनाना समय की आवश्यकता बनता जा रहा है। इसी दिशा में जिला बिलासपुर के करोट गांव निवासी किसान प्रेम लाल ठाकुर पिछले लगभग 20 वर्षों से बड़ी इलायची की खेती कर अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं। शुरुआत में उन्होंने सीमित क्षेत्र में इसकी खेती की, लेकिन बेहतर उत्पादन और अच्छे बाजार भाव को देखते हुए अब धीरे-धीरे इसका क्षेत्र बढ़ा रहे हैं। जिन किसानों के पास सिंचाई के लिए पानी की पर्याप्त एवं नियमित उपलब्धता है, वे इस फसल को अपनाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं।

जब इस संबंध में प्रगतिशील किसान प्रेम लाल ठाकुर से बातचीत की तो उनका कहना है कि लगभग एक बीघा जमीन में प्रतिवर्ष औसतन 2 से 3 क्विंटल बड़ी इलायची का प्राकृतिक तौर पर उत्पादन कर रहे हैं तथा बाजार में अच्छी कीमत भी मिल रही है। वर्तमान में बड़ी इलायची के लगभग 1.80 लाख रुपये प्रति क्विंटल यानी 1,800 रुपये प्रति किलोग्राम तक दाम प्राप्त हो रहे हैं। ऐसे में यह फसल किसानों के लिए आय का एक अच्छा विकल्प बन सकती है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में, जहां परंपरागत फसलों का उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है, वहां उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप बड़ी इलायची की खेती को अपनाया जा सकता है।

बड़ी इलायची की खेती की तकनीक बताते हुए प्रेम ठाकुर कहते हैं कि लगभग तीन गुणा तीन फुट की दूरी पर पौधे लगाए हैं तथा पौधों के समुचित विकास और बेहतर उत्पादन के लिए पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। जिन किसानों के पास स्थायी रूप से सिंचाई सुविधा उपलब्ध है, वे इस खेती में संभावनाएं तलाश सकते हैं। विशेषकर ऐसी भूमि, जहां अन्य फसलों का उत्पादन अपेक्षाकृत कठिन होता है, वहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल इस प्रकार की वैकल्पिक खेती लाभकारी साबित हो सकती है।

उनका कहना है कि बड़ी इलायची की तुड़ाई सामान्यतः नवंबर-दिसंबर माह में की जाती है। तुड़ाई के बाद इसकी उचित सफाई, धुलाई और सुखाई जरूरी होती है तथा अच्छी तरह सुखाकर इसे बिक्री के लिए तैयार किया जाता है। फसल की उचित देखभाल और कटाई के बाद सही ढंग से प्रसंस्करण करने से उत्पाद की गुणवत्ता बनी रहती है।

बड़ी इलायची का उपयोग मसालों के साथ-साथ औषधीय उत्पादों में भी किया जाता है। इसकी विशिष्ट सुगंध और उपयोगिता के कारण बाजार में इसकी अच्छी मांग बनी रहती है। इसकी खास बात यह है कि इसे जंगली जानवर और पक्षी सामान्यतः नुकसान नहीं पहुंचाते। ऐसे में यह खेती न केवल लाभकारी हो सकती है, बल्कि जंगली जानवरों से परेशान और खेती से विमुख होते किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक अहम जरिया भी बन सकती है।

उनका कहना है कि युवा पीढ़ी खेती-बाड़ी को केवल पारंपरिक व्यवसाय के रूप में न देखकर इसे स्वरोजगार और आय अर्जित करने के अवसर के रूप में अपना सकती है। आज युवा खेती से दूर होते जा रहे हैं, जबकि बदलती परिस्थितियों में उपयुक्त फसलों का चयन कर कृषि को लाभकारी बनाया जा सकता है। बड़ी इलायची जैसी वैकल्पिक फसल कम भूमि वाले किसानों के लिए भी आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकती है, बशर्ते भूमि, जलवायु, पानी की उपलब्धता और बाजार की स्थिति इसके अनुकूल हों।

प्रदेश सरकार भी प्राकृतिक तौर पर उत्पादित गेहूं, मक्का, जौ, हल्दी तथा अदरक के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रदान कर रही है, ताकि प्रदेश के किसानों की आर्थिकी को सुदृढ़ किया जा सके। प्रदेश के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि विभिन्न फसलों के लिए सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है। सरकार के इस कदम से प्रदेश के हजारों किसानों को सीधा लाभ प्राप्त हो रहा है।

*क्या कहते हैं अधिकारी:उपनिदेशक कृषि कुलभूषण धीमान का कहना है कि बड़ी इलायची की खेती के माध्यम से किसान अपनी अतिरिक्त आय सृजित कर सकते हैं, बशर्ते उनके पास पर्याप्त पानी की उपलब्धता हो। उनका कहना है कि इस खेती को न तो जंगली जानवर न ही पक्षी नुकसान पहुंचाते हैं, ऐसे में यह फसल किसानों के लिए एक बड़ी राहत प्रदान करती है। साथ ही बड़ी इलायची को बाजार में अच्छे दाम भी प्राप्त होते हैं।

उनका कहना है कि विभाग भी किसान प्रेम ठाकुर के साथ मिलकर दूसरे किसानों को जोड़ते हुए इस दिशा में कार्य करने का प्रयास करेगा ताकि किसानों को अतिरिक्त आय के साधन सृजित कर आर्थिकी को सुदृढ़ किया जा सके।