चण्डीगढ- 10 मई - मनुष्य संसार की माया में उलझकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल चुका है, परंतु जो सज्जन सतगुरु की शरण में आ कर उनके आदेशानुसार अपनी जीवनयात्रा तय करते हैं वे भीतर से निर्मल होने लग जाते हैं, जिस प्रकार मंदिर में चढ़ाई गई मिठाई ‘प्रसाद’ बन जाती है, उसी प्रकार सतगुरु की शरण में आने वाला व्यक्ति भी परिवर्तित होकर दिव्यता से भर जाता है अर्थात सन्तों का संग करके इन्सान स्वयं को बदलने और उज्ज्वल बनने की प्रेरणा प्राप्त करते है और निर्मल हो जाते हैं, ये उद्गार आज चंडीगढ़ के सैक्टर 30 में स्थित संत निरंकारी सत्संग भवन में आयोजित विशाल सत्संग में हजारों श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए लुधियाना से आए संयोजक श्री अमित कुंद्रा जी ने व्यक्त किए ।
इस दौरान श्री कुंद्रा ने यह भी कहा कि मनुष्य का जीवन अनेक प्रकार के “कांटों” से भरा हुआ है। कभी अहंकार का कांटा, कभी मोह का, कभी क्रोध का, तो कभी लोभ, कभी पाप का। ये कांटे केवल शरीर को ही नहीं बल्कि आत्मा को भी पीड़ा देते हैं। धार्मिक ग्रन्थ हमें यह शिक्षा देते है कि इन कांटों को निकालने के लिए भी कभी-कभी दूसरे कांटे की आवश्यकता पड़ती है। संतों ने इस सत्य को बड़े सरल ढंग से समझाया है कि जैसे किसी व्यक्ति के पैर में कांटा चुभ जाए तो वह दूसरा कांटा लेकर पहले कांटे को निकालता है और कार्य पूर्ण होने के बाद दोनों कांटों को त्याग देता है। ठीक इसी प्रकार सत्संग, सेवा, सिमरन, और सत्गुरू के उपदेश मनुष्य को संसार के दुखों और विकारों से बाहर निकालने के साधन हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार मंदिर में चढ़ाई गई मिठाई ‘प्रसाद’ बन जाती है, उसी प्रकार सतगुरु की शरण में आने वाला व्यक्ति भी परिवर्तित होकर दिव्यता से भर जाता है।
श्री अमित कुंद्रा ने बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के प्रेममय जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने केवल उपदेश देने के लिए नहीं बल्कि स्वयं उदाहरण बनकर जीवन जीने का मार्ग दिखाया। इसलिए हमें भी केवल सिमरन करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना है ।
श्री कुन्द्रा ने सत्गुरू माता सुदीक्षा जी द्वारा जी रही शिक्षाओं को दोहराते हुए कहा कि प्रेम, समर्पण और नम्रता को आध्यात्मिक जीवन का आधार बनायें । जीवन में पद, प्रतिष्ठा और सांसारिक उपलब्धियां स्थायी नहीं हैं। सत्ता, दौलत और शोहरत सब क्षणभंगुर हैं तथा समय समय पर परिस्थितियां बदलती रहती हैं, इसलिए मनुष्य को इन अस्थायी चीजों के पीछे भागने की बजाय उस सत्य से जुड़ना चाहिए जो सदा रहने वाला है।
अपने विचारों के दौरान उन्होंने अनेक प्रेरणादायक उदाहरणों और प्रसंगों के माध्यम से यह समझाया जब आत्मा को परम सत्य की जानकारी हो जाती है और भक्त अपने अहंकार को त्यागकर स्वयं को खाली करता है, तब परमात्मा उसके भीतर गूंजने लगता है।
श्री अमित कुंद्रा जी ने कहा कि निरंकार का ज्ञान प्राप्त करना केवल सुनने या बोलने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे जीवन में धारण करना आवश्यक है। उन्होंने नम्रता को ईश्वर प्राप्ति का माध्यम बताते हुए कहा कि जैसे पानी नीचे की ओर बहकर सागर में मिल जाता है, वैसे ही मनुष्य नम्र होकर परमात्मा से जुड़ सकता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि सेवा, सुमिरण, सत्संग और समर्पण के भाव को जीवन में अपनाकर ही सच्चा आनंद प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य को दूसरों की खुशियों में खुश होना सीखना चाहिए तथा अपने जीवन को प्रेम, मुस्कुराहट और सकारात्मकता से भरना चाहिए।
अपने उद्बोधन के अंत में उन्होंने समस्त संगत के लिए अरदास करते हुए कहा कि सतगुरु सभी को खुशियां दें और अपने चरणों से कभी दूर न करे और सभी के जीवन को प्रेम एवं भक्ति से भर दें । सत्संग के दौरान वातावरण अत्यंत भक्तिमय एवं आनंदमय बना रहा। उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति गीतों, विचारों और सत्संग के माध्यम से आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया। कार्यक्रम का समापन सामूहिक अरदास के साथ हुआ।
इससे पूर्व यहां के संयोजक श्री नवनीत पाठक जी ने चण्डीगढ़ की सर्वत्र साधसंगत की ओर से श्री कुन्द्रा जी का लुधियाना से पधारने पर धन्यवाद व स्वागत किया ।