मनुष्य संसार की माया में उलझकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल चुका है, परंतु जो सज्जन सतगुरु की शरण में आ कर उनके आदेशानुसार अपनी जीवनयात्रा तय करते हैं वे भीतर से निर्मल होने लग जाते हैं, जिस प्रकार मंदिर में चढ़ाई गई मिठाई ‘प्रसाद’ बन जाती है, उसी प्रकार सतगुरु की शरण में आने वाला व्यक्ति भी परिवर्तित होकर दिव्यता से भर जाता है