CHANDIGHARH,13.11.20-प्राचीन कला केन्द्र की पिछले 6 महीनों से जारी बैव बैठकों का सिलसिला बददस्तूर जारी है जिसमें देशभर से विभिन्न शास्त्रीय कलाओं में पारंगत कलाकार भाग ले चुके हैं और सिलसिला जारी है। प्राचीन कला केन्द्र कोविड के नियमों के चलते बैव बैठकों के जरिए संगीत को संगीत प्रेमियों तक पहुंचाने में भरपूर योगदान दे रहा है ।

आज की बैवबैठक में जयपुर की स्वाति अग्रवाल ने कत्थक नृत्य प्रस्तुत किया । स्वाति अल्पायु से ही कत्थक नृत्य सीख रही है । उन्होंने कत्थक की विधिवत शिक्षा अपने गुरू श्री गिरधारी जी महाराज से प्राप्त की । कत्थक नृत्य के पारम्परिक रूप से छेड़छाड़ न करते हुए स्वाति ने अपनी रचनात्मक विचारों से कत्थक को नए आयाम दिए हैं। स्वाति के नृत्य में उनका कठिन परिश्रम,रियाज़ और अभिनय अंग पर खास पकड़ उन्हें संगीत जगत में नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण पहलू रहा है ।

स्वाति के कार्यक्रम की शुरूआत श्री राम स्तुति से की जिसके बोल थे ‘‘रामाय रामचंद्र आए’’ उपरांत स्वाति ने कृष्ण स्तुति द्वारा कृष्ण के नर्तक रूप का बखूबी वर्णन किया। इस बंदिश के बोल थे ‘‘नागर नट नृत करत मुरली अधर बाजे’’ । इसके पश्चात स्वाति ने जयपुर घराने के शुद्ध पारम्परिक नृत्य प्रस्तुत किया । तीन ताल में निबद्ध कत्थक में स्वाति ने विलम्बित मध्य एवं द्रुत लय में थाट,गणेश परन,तिहाई,तोड़े,टुकड़े,गत निकास,चक्र लड़ी आदि प्रस्तुत किया ।इसमें स्वाति ने विभिन्न नायिकाओं जैसे विप्रलभदा एवं मुग्धा नायिका की खूबसूरत प्रस्तुति पेश की ।

कार्यक्रम का समापन स्वाति ने एक खूबसूरत ठुमरी से किया जिसके बोल थे ‘‘छाड़ो छाड़ो न कन्हाई नारी देखे सगरी’’ । स्वाति ने अभिनय अंग,पैरों की चालों एवं नृत्य की खूबसूरत मुद्राओं से कार्यक्रम को चार चांद लगा दिए ।