चंडीगढ़, 25 सितम्बर 2020 : भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य, पार्टी के स्तम्भ स्वर्गीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर चंडीगढ़ भाजपा के कार्यकर्ताओं ने प्रदेश भर के बूथ स्तर तक के अपने वरिष्ठ नेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा पर श्रद्धा सुमन अर्पित किये और उन्हें स्मरण किया। इस अवसर पर पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री राम माधव द्वारा "एकात्म मानववाद" विषय पर संवाद का भी वर्चुअल और फिजिकल स्तर पर पार्टी कार्यालय "कमलम" में आयोजित किया गया।

उपरोक्त कार्यक्रमों की जानकारी प्रदान करते हुए पार्टी के प्रदेश महामंत्री और कार्यक्रमों के संयोजक चन्द्र शेखर ने बताया कि इस उपलक्ष में पार्टी 25 सितम्बर से लेकर 2 अक्टूबर तक "आत्म निर्भर सप्ताह" मनाने जा रही हैं। इसी श्रंखला को लेकर आज पार्टी के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर बूथ स्तर तक अपने - अपने घरों में उनके चित्र के आगे पुष्प अर्पित किये। इस अवसर पर पार्टी ने 597 बूथों पर पार्टी का ध्वज लहराया और बूथ स्तर तक सभी पदाधिकारियों, बूथ अध्यक्षों ने घरों में पार्टी के चिन्ह वाली अपने नाम की प्लेट भी लगायी। आज सुबह पार्टी कार्यलय में पार्टी कार्यकर्ताओ ने प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी जी का पंडित दीनदयाल जी के विषय में दिए गए उद्बोधन को भी सुना। जिसमे नरेंदर मोदी ने आज के समय में पंडित जी के विचारों की सार्थकता के विषय में बात की।

कार्यक्रमों के आयोजन के उपरांत आज के संवाद "एकात्म मानववाद" के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय महामंत्री राम माधव का पार्टी कार्यालय आगमन पर प्रदेशाध्य्क्ष अरुण सूद, कार्यक्रम संयोजक प्रदेश महामंत्री चन्द्र शेखर ने भव्य स्वागत किया। मुख्यातिथि के स्वागतीय उद्बोधन के बाद प्रदेश अध्यक्ष अरुण सूद ने कहा कि हमारा सौभाग्य हैं कि हम उस पार्टी के सिपाही हैं जिनके संस्थापकों ने अपनी दूरदृष्टि से नए भारत के उद्य को लेकर अपने आदर्शों, विचारों और राष्ट्रहित निर्णय हेतू अपने प्राण न्योछावर कर इसकी नीव डाली थी। उसी नीव की परिकाष्ठा पर वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा और सम्पूर्ण केन्द्रीय नेतृत्व और मोदी सरकार का मंत्रिमंडल उनके द्वारा देखे गए भारत के निर्माण की ओर अग्रसर हैं।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के "एकात्म मानववाद" पर विचारों और उनके महत्व पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय महासचिव माधव राव ने अपने संवाद में कहा कि पंडित जी "एकात्म मानववाद" को सैद्धांतिक स्वरूप में नहीं बल्कि आस्था के स्वरूप में लेते थे। व्यक्ति की आत्मा को सर्वोच्च स्थान पर रखने वाले उनके सिद्धांत में आत्म बोध करने वाले व्यक्ति को समाज का शीर्ष माना गया। आत्म बोध के भाव से उत्कर्ष करता हुआ व्यक्ति "सर्वे भवन्तु सुखिनः" के भाव से जब अपनी रचना धर्मिता और उत्पादन क्षमता का पूर्ण उपयोग करें तब "एकात्म मानववाद" का उदय होता हैं। पाश्चात्य का भौतिकवादी विचार जब अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ने की अवस्था में था तब पंडित जी ने अपने इस प्रकार के विचारों को सभी के सम्मुख रखकर वस्तुतः पश्चिम से वैचारिक युद्ध का शंखनाद था। उन्होंने निर्भरता के इस कोरें शब्दों वाले सिद्धान्त में 'मानववाद नामक आत्मा ' की स्थापना की। इसमें से भौतिकवाद के जिन्न को बाहर ला फेंका। पंडित जी किसी भी समाज या देश की सम्पूर्णता तभी मानते थे जब समाज के गरीब, वंचित, पीड़ित, दलित और पंक्ति के अंत में खड़े व्यक्ति तक वह सभी लाभ पहुंचे जो समाज के उच्च व कुलीन वर्गों के लिए ही उपलब्ध हैं।

यद्यपि उनकी आकस्मिक मृत्यु से विश्व की राजनीति उस समय उनके इस प्रयोग के कार्यरूप देखने से वंचित रह गई तथापि सिद्धांत रूप में तो वे उसे स्थापित कर ही गए थे। वास्तव में "राष्ट्रवाद एक परिबार" के भाव को आत्मा में विराजित करना और तब परमात्मा की ओर आशा से देखना, यह उनकी एकात्मकता का शब्दार्थ हैं। इसी रूप में हम राष्ट्र का निर्माण ही नहीं करें अपितु उसे परम वैभव की और ले जायें। उनके सिद्धांत के एक शब्द "एकात्म" में प्राण स्थापित करता हैं। "मानववाद" अपनी नम्रता से प्राणमय उत्पादित कर राष्ट्र को समर्पित भाव से अर्पित कर दे और स्वयं भी सामंजस्य और परिवार बोध से उपभोग करता हुआ विकास पथ पर अग्रसर रहें।