NEWDELHI,24.09.20,डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि आप जानते हैं कि अखिल भारतीय स्तर पर ये अभियान चल रहा है, संसद से, रोड़ से, प्रेस के जरिए, विभिन्न प्रादेशिक राजधानियों में और राजधानी के अलावा और शहरों में भी, तो उसी श्रृखंला में, उसी का एक हिस्सा है, तो बिना किसी विलंब के मैं आपसे तीन भागों में बात करना चाहूंगा।

वैसे ये जो एक्ट हैं, वो भी तीन हैं, विश्वासघात भी तीन हैं, काले कानून भी तीन हैं, लेकिन मेरी बात भी तीन भागों में है। एक तो ये एक्ट्स क्या हैं, कृषि के विरुद्ध कैसे हैं। दूसरा, इस संदर्भ में व्यापक रुप से कृषि की व्यवस्था क्या है, जो अपनी तूती बजाते हैं, डींगे मारती है सरकार कि हमने ये किया, वो किया, उसकी स्थिति क्या है। तो एक्ट्स और कानून से हम थोड़ी जनरल अवस्था में जाएंगे और तीसरा कि क्या हुआ हमारी संसद में, जो कि नहीं होना चाहिए था, इस प्रकार के विषय में विशेष रुप से कभी नहीं होना चाहिए। जहाँ तक इन तीन एक्ट्स का सवाल है, मैं आपको बताना चाहता हूं कि सबसे बड़ा व्यंग्य और मजाक उड़ाया गया इस बात से कि सरकार बार-बार कहती है, माननीय प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमने ये कृषकों के समर्थन में बनाया है, अगर ऐसे मित्र हों तो शत्रुओं की आवश्यकता नहीं है। If you have friends like this, you don't need enemies.

पहला बिंदु आप जानते हैं कि एमएसपी का है। एमएसपी का जिक्र कहीं भी इन एक्ट में नहीं है, जिक्र भी नहीं है और ये बात सही है तकनीकी रुप से कि ये भी नहीं लिखा है कि हम एमएसपी को निरस्त करते हैं या हटाते हैं। लेकिन ये उस प्रकार का सच है जिसको हम अर्धसत्य कहते हैं। वो वाला अर्धसत्य है जो झूठ से बड़ा होता है और इसके लिए ऐसे बड़े महान व्यक्ति धर्मराज युधिष्ठिर जी भी, जब वो अश्वत्थामा हतो कह गए थे, तो उसके लिए उतने बड़े व्यक्ति भी अपमानित हुए थे, क्योंकि ये टेक्निकली करेक्ट चीज सब्सटेंशली गलत है पूरी तरह से। एमएसपी की निरस्तता स्पष्ट रुप से नहीं है, लेकिन कोई दर्जा, कोई औचित्य, कोई वजूद एमएसपी का नहीं छोडा है। अगर आप ये कहते हैं कि आप इस मंडी में चाहें तो जाएं, चाहे तो एमएसपी पर बेचें, लेकिन साथ-साथ खड़े व्यक्ति को भी आप बेच सकते हैं, आप जो कहें करारनामा कर सकते हैं। आपको आवश्यकता नहीं है घर जाने की, यहाँ पर भी जा सकते है, वहाँ भी जा सकते हैं, कहीं भी जा सकते हैं, कोई भी कीमत लगा सकते हैं, तो ये बताइए कि ये कहना कि हमने एमएसपी निरस्त नहीं की है, ये वही अश्वत्थामा हतो हुआ ना। अर्धसत्य ऐसा जो झूठ से बड़ा है। कौन जाएगा, अनिवार्यता जो होती है एमएसपी की, उसके पीछे, जब आपने ये विकल्प दिया है कि कहीं भी जाओ आप, कौन कीमत निर्धारित करेगा, प्राईस डिस्कवरी। तो हमने यहाँ तक कहा सरकार में, बार-बार कहा, संसद में कहा, संसद में बिल आने के पहले भी कहा कि और सब कुछ छोड़ दो आप, कम से कम ये लिख दो कि जो भी कीमत होगी, करारनामे से, मेरे और आपके बीच में, न्यूनतम उसकी सीमा, मैक्सिमम नहीं, न्यूनतम सीमा एमएसपी होगी, इतना तो लिख दो, नहीं लिखेंगे, क्यों, क्योंकि ये हमारी जिद्द की राजनीति है, ये हमारी अहंकार की राजनीति है। हमने कहा कि इसे सिलेक्ट कमेटी में भेज दो, स्टेंडिंग कमेटी में भेज दो, ये तो सब संसदीय प्रणाली की चीजें हैं, ये तो कोई विदेशी चीजें नहीं है। तीन महीने और लगेंगे आपको एक सोचा, समझा, ठीक-ठाक एक सुझाव आएगा, उसके ऊपर आप अमल करके ना मानें, तो भी कम से कम आपके पास व्यापक रुप से लिखित दस्तावेज आएगा। नहीं, आज, अभी, इसी वक्त तुरंत पास करना है, क्यों, जैसे कोई अन्नदाता के विषय में नहीं है, जैसे ये कोई महत्वपूर्ण नहीं है, जैसे जो-जो मुद्दे मैं आपको बता रहा हूं, वो महत्वपूर्ण नहीं है। तो एमएसपी की बाध्यता गई, उसका वजूद गया, उसका जिक्र गया और उसका कर्जा गया और मूल्य निर्धारण की कसौटी जो थी वो, प्राईस डिस्कवरी का तौर तरीका, वो भी गया।

ऐसा करके आप फिर भी बरगला रहे हैं पूरे देश को ये कहकर कि हमने एमएसपी नहीं हटाई है, इसलिए मैंने आपको अश्वत्थामा हतो का उदाहरण दिया। लोगों का ये मानना है कि आप परोक्ष रुप से और ज्यादा परोक्ष भी नहीं है, आप शांता कुमार समिति को सीधा कार्यान्वित कर रहे हैं सुझाव, जो है कि लगभग आप एक लाख करोड़ रुपये बचा लेंगे अगर आप प्रिक्योरमेंट निर्धारित करके खरीदेंगे नहीं। मैं अगर एमएसपी पर नहीं खरीदता हूं इनसे, तो एक लाख करोड़ रुपए देश में बच जाएगा, तो इसे बचाने का सीधा तो कर नहीं सकते तरीका, अब ये तो नहीं कर सकते कि एमएसपी जीरो/ अबोलिश्ड तो आपने ये एक बड़ा खतरनाक षड़यंत्र वाला, बरगलाने वाला, झूठा, फरेबी तौर तरीका अपनाया है।

एक और बिंदु है, जिसको आप कहते हैं करारनामे वाली कृषि, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग। 75 साल में क्या इस देश में हमसे ज्यादा अक्ल वाले, हमारे संविधान निर्माता, हमसे ज्यादा समझदार ज्ञानी लोग नहीं रहे हैं। उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग 75 साल से क्यों नहीं करवाया। पहली बार ये जबरदस्त ज्ञान ये सरकार लेकर आई है, क्यों, क्योंकि उनको मालूम है कि इस देश की औसतन जमीन का साईज है 2 एकड़ और 86 प्रतिशत 5 एकड़ से कम है, लेकिन औसतन 2 एकड़ है। ये बताइए मुझे कि 2 एकड़ वाले औसतन का क्या बार्गेनिंग पावर है, इस जायंट से, इस गोलियत के सामने वो डिफीट भी नहीं होता है। क्या स्वतंत्रता है, क्या अधिकार क्षेत्र है, जिसको आप कहते हैं क्या बार्गेनिंग पावर है, शून्य है, जो करारनामा करेगा, उद्योगपति से, बड़ी-बड़ी इंडस्ट्री से, बराबरी के अधिकार क्षेत्र और हक को लेगा कृषि में, वाणिज्य में। आप वो कर रहे हैं जो हमारे संविधान के निर्माताओं ने कभी नहीं सोचा, 70-75 साल में नहीं सोचा, नेहरु और उनके बाद सभी प्रधानमंत्रियों ने नहीं सोचा। आखिर विनोबा भावे जैसे लोगों ने भूदान की बात की, कानून पास किया हमने जमींदारी हटाने का।