ROHTAK,22.02.20-महर्षि दयानन्द यूनिवर्सिटी, रोहतक की पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की प्रोफेसर सुमेधा धनी ‘बौद्ध’ ने थाईलैंड के ‘पथुमथानी’ शहर में स्थित वाट प्रा धम्मकाया टैंपल व ‘द वल्र्ड अलायंस आॅफ बुद्धिस्ट’ (बौद्ध विश्व संगठन) द्वारा आयोजित माघ पूजा में भाग लिया व आकर बताया कि द वल्र्ड अलायंस आॅफ बुद्धिस्ट एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था है जोकि 75 बुद्धिस्ट संगठनों का समूह है व इसके सदस्य 30 देशों से प्रतिनिधित्व करते हैं। बौद्ध विश्व संगठन ने फरवरी माह मंे थाईलैंड की बुद्धिस्ट संस्थाओं के साथ मिलकर माघ पूजा का आयोजन किया और थाई भाषा में इसको ‘माक बूचा दिवस’ कहा जाता है। प्रोफेसर सुमेधा धनी ने बताया कि उनका निमंत्रण ‘द वल्र्ड अलायंस आॅफ बुद्धिस्ट’ के प्रेजिडेंट वेन. डाॅ. पोनचाई पालावधम्मो द्वारा आया व उन्होंने संघकाया भारत के प्रेजिडेंट भंते प्रशिल गौतम द्वारा निर्देशित उनका प्रतिनिधित्व किया। भारत से कुछ गिने-चुने लोगों द्वारा ही इस माघ पूजा में भाग लिया गया। उन्होंने बताया कि माघ माह को भारत की प्राचीन पालि भाषा में माघ मासो कहा जाता है। यह पूर्णिमा हमें भगवान् बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण घटनाओं का स्मरण कराती है। सम्यक सम्बोधि प्राप्ति के दस माह के पश्चात् भगवान बुद्ध के जीवन में राजगृह के समीप अवस्थित वेलूवन में 4 महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुई। एक तो बिना पूर्व नियुक्ति एवं नियोजन के विभिन्न स्थानों से 1250 पुरुष भगवान् बुद्ध के समक्ष एकत्रित हुए। दूसरा .भगवान् बुद्ध के द्वारा उन्हें ‘एहि भिक्खवे’ बोलकर सीधा प्रव्रजित किया गया। तृतीय वे सभी 1250 भिक्षु अर्हत् हो गये। चैथा भगवान् बुद्ध के द्वारा उन भिक्षुओ को भिक्षु जीवन के सम्बन्ध में विशेष उपदेश का निर्देश किया गया, जिसे ‘ओवाद पातिमोक्ख’ के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार की घटनाएँ घटित होने से संघ दिवस भी कहा जाता है क्योंकि एक ही दिन इतने सारे व्यक्ति भिखु बने व संघ की उत्तम नींव पड़ी।
धम्मकाया फाउन्डेशन द्वारा इसे एक अविस्मरणीय दिवस के रूप में ‘द वल्र्ड अलांयस आॅफ बुद्धिस्ट’ के साथ मिलकर मनाया गया। तकरीबन एक लाख लोगों जोकि दुनियाभर से आए बुद्धिस्ट व भिक्खु थे उन्होंने सूर्योदय के समय से लेकर सूर्यास्त तक माघ पूजा के कई आयोजनों का आयोजन किया। सूर्योदय के समय धम्मकाया फाऊन्डेशन द्वारा बनाये गए चैत्य व भिक्खुओं का सम्मान और धम्मासकापावत्ना सुत का पाठ, ध्यान लगाना व जीवन में नैतिक मूल्यों को बढाने के लिए भगवान बुद्ध के दिखाये रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके साथ ही हजारों की संख्या में उपस्थित उपासक व उपासिकाएं भिक्खुओं को धम्मदान करते हैं। धम्मकाया टैंपल द्वारा आयोजित इन सभी क्रियाकलापों का मुख्य उद्देश्य मनुष्य मात्र में मानसिक शांति लाना व शांतिप्रिय समाज का निर्माण करना है। सूर्यास्त के बाद झिलमिलाती लाखों लालटेनों से सारा चैत्य परिसर जगमगा उठता है। इसकी तुलना एक भव्य ओलम्पिक खेलों के उदघाटन समारोह से की जा सकती है।
प्रो. सुमेधा ने बताया कि स्तूप का आकार भारत से ही आया है और यह बुद्ध, धम्म व संघ को दर्शाता है। स्तूप का डिजाईन सम्राट अशोक के समय से बनाया जा रहा है। इसके आकार में 300,000 धम्मकाया बुद्ध की मूर्तियां हैं व चैत्य के अन्दर एक 14 टन की शुद्ध चांदी की भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापित है। यहां 400,000 उपासक व उपासिकाएं बैठकर ध्यान कर सकते हैं।
प्रो. सुमेधा ने बताया कि माघ पूर्णिमा के सम्बन्ध में एक और बात भी प्रसिद्ध है कि उस समय भगवान् बुद्ध वैशाली नगर में विचरण कर रहे थे। इसी दिन (माघ पूर्णिमा) सुबह भगवान् भिक्षु संघ के साथ भिक्षाटन के लिए जाते हैं। उस समय भगवान् बुद्ध वैशाली के उपासक एवं उपासिकाओं को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि ‘आज ही हम इस वैशाली नगर को छोड़कर जा रहे हैं। वैशाली में तथागत की यह अन्तिम भेंट होगी।’ यह ध्यान देने योग्य है कि भगवान बुद्ध जब स्वयं के बारे बात कर रहे होते थे तो वह तथागत शब्द का प्रयोग करते थे। भगवान् के इस कथन से वैशाली के लिच्छवि जन दुःखी तथा खिन्न हो गये और यह भगवान् के उद्गार अति अल्प समय में ही सम्पूर्ण वैशाली नगर में फैल गये। भोजन के उपरान्त तथागत आनन्द एवं भिक्षु संघ के साथ कुसुमावती नदी के किनारे अवस्थित उंचे शिलाखण्ड पर पहुंचे और उसी स्थान से उन्होंने वैशाली का अन्तिम दर्शन किया। आनन्द को भगवान् ने कहा ‘आनन्द यह मेरी वैशाली को अन्तिम दृष्टि भेंट हैं।’ इस प्रकार का कथन कर भगवान् वैशाली तथा वैशाली के जनों को छोड़कर जा रहे थे। चारों ओर से भगवान् का अन्तिम दर्शन करने श्रद्धावानों की भीड़ आ रहीं थी। इसलिए भगवान् कुछ समय के लिए वहाँ रूक गये। अन्त में वैशाली के उत्तर सीमा पर इकट्ठा जनसमुदाय के अतुट श्रद्धा एवं प्रेम को देख भगवान् ने उन लिच्छवि जनों को अपना भिक्षापात्र ‘स्मृति चिन्ह’ के रूप में भेंट कर दिया। इसी प्रकार वैशाली के उत्तर सीमा पर तथागत ने अपने दोनों हाथों को ऊपर करते हुए वैशाली से कुशीनगर के लिए प्रयाण किया। इसीलिए इसे महापरिनिर्वाण की घोषणा दिवस भी कहा जाता है । थाईलैंड में इस पूर्णिमा को ‘माघ पूजा दिवस’ ;डंहीं चनरं कंलत्रज्ीरू डंाीं ठनबींद्ध के रूप में मनाया जाता है।
लाओस तथा कम्बोडिया इन थेरवादी राष्ट्रों में भी इसी प्रकार बड़े हर्षोल्हास से मनाया जाता है। म्यान्मार में तण्हकर बुद्ध से शाक्यमुनि गौतम बुद्ध तक अट्ठाविसति बुद्धों का स्मरण किया जाता हैं। यह पर्व दस दिवस तक मनाया जाता है। जिसे वहां ष् निसस उववद व िज्ंइंनदह वत ज्ंइवकूमष् कहा जाता है। उन्होंने कहा कि यह उनके जीवन में घटित बहुत ही रोमांचक व पवित्र घटना है जो उन्हें भगवान बुद्ध की शिक्षाओं की ओर अग्रसर कर गई है।