GWALIOR,20.02.20,कोरोनानामक वायरस का संक्रमण देखते ही देखते जापान,जर्मनी,अमेरिका,फ्रांस, कनाडा,रूस समेत विश्व के 30 से अधिक देशों में फैल जाता है तो निश्चित ही वैश्वीकरण के इस दौर में इस प्रकार की घटनाएं हमें ग्लोबलाइजेशन के दूसरेडरावने पहलू से रूबरू कराती हैं। क्योंकि आधिकारिक आंकड़े बताते हैं किकोरोना वायरस के संक्रमण से विश्व भर में अब तक 2012 मौतें हो चुकी हैं औरलगभग 75303 लोग इसकी चपेट में हैं जबकि आशंका है कि यथार्थ इससे ज्यादाभयावह हो सकता है। लेकिन यहाँ बात केवल विश्व भर में लोगों के जीवन औरस्वास्थ्य को होने वाले नुकसान तक ही सीमित नहीं है बल्कि पहले से मंदी झेलरहे विश्व में इसका नकारात्मक प्रभाव चीन समेत उन सभी देशों कीअर्थव्यवस्था पर भी पड़ना है जो चीन से व्यापार करते हैं जिनमे भारत भीशामिल है। बात यह भी है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स और आर्टीफिशियलइंटेलीजेंस के इस अति वैज्ञानिक युग में जब किसी देश में एक नए तरह कासंक्रमण फैलता है जो सम्भवतः एक वैज्ञानिक भूल का अविष्कार होता है, जिसकेबारे में मनुष्यों में पहले कभी सुना नहीं गया हो और उसकी उत्पत्ति को लेकरबायो टेरेरिज्म जैसे विभिन्न विवादास्पद सिद्धान्त सामने आने लगते हैं तोयह ना सिर्फ हैरान बल्कि परेशान करने वाले भी होते हैं। इसलिए यह आवश्यक होजाता है कि विज्ञान के दम पर प्रकृति से खिलवाड़ करने की मानव की क्षमता औरउसके आचरण को सम्पूर्ण सृष्टि के हित को ध्यान में रखते हुए गंभीरता केसाथ नए सिरे से परिभाषित किया जाए।

क्योंकि चीन में कोरोना वायरसका संक्रमण जितना घातक है उससे अधिक घातक वो अपुष्ट जानकारियां हैं जोइसकी उत्पत्ति से जुड़ी हैं। शायद इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के चीफ कोकहना पड़ा कि ,"" विश्व स्वास्थ्य संगठन में हम केवल वायरस से ही नहीं लड़रहे बल्कि साज़िश की अफवाहों से भी लड़ रहे हैं जो हमारी ताकत को कमजोर कररही हैं।"

दरअसल चीन के वुहान से शुरू हुए इस कोरोना संक्रमण कोलेकर अलग अलग देश अलग अलग दावे कर रहे हैं। जहाँ एक ओर रूस, अरब, सीरिया, जैसे देश चीन में फैले कोरोना वायरस के लिए अमेरिका और इजरायल कोदोष दे रहे हैं वही अमेरिका खुद चीन को ही कोरोना का जनक बता रहा है। मज़ेकी बात यह है कि सबूत किसी के पास नही हैं लेकिन अपने अपने तर्क सभी के पासहैं। रूस का कहना है कि कोरोना वायरस अमेरिका द्वारा उत्पन्न एक जैविकहथियार है जिसे उसने चीन की अर्थव्यवस्था चौपट करने के लिए उसके खिलाफइस्तेमाल किया है। इससे पहले रूस 1980 के शीत युद्ध के दौर में एच आई वी केसंक्रमण के लिए भी अमेरिका को जिम्मेदार बता चुका है। जबकि अरबी मीडिया काकहना है कि अमेरिका और इजरायल ने चीन के खिलाफ मनोवैज्ञानिक और आर्थिकयुद्ध के उद्देश्य से इस जैविक हथियार का प्रयोग किया है। अपने इस कथन केपक्ष में वो विभिन्न तर्क भी प्रस्तुत करत है। सऊदी अरब समाचार पत्र अलवतनलिखता है कि मिस्र की ओर से इस घोषणा के बाद कि कुछ दिनों बाद वो चिकनउत्पादन में आत्मनिर्भर हो जाएगा और निर्यात करने में भी सक्षम हो जाएगाइसलिए अब वह अमेरिका और फ्रांस से चिकन आयात नहीं करेगा, अचानक बर्ड फ्लूफैल जाता है और मिस्र का चिकन उद्योग तबाह हो जाता है। इसी तरह जब चीन ने 2003 में घोषणा की कि उसके पास दुनिया का सबसे अधिक विदेशी मुद्रा भंडार हैतो उसकी इस घोषणा के बाद चीन में अचानक सार्स फैल जाता है और चीनी विदेशीमुद्रा भंडार विदेशों से दवाएँ खरीद कर खत्म हो जाता है। इसी प्रकार सीरियाका कहना है कि कोरोना वायरस का इस्तेमाल अमेरिका ने चीन के खिलाफ उसकीअर्थव्यवस्था खत्म करने के लिए किया है। सीरिया के अनुसार इससे पहलेभी अमेरिका एबोला, जीका, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, एंथ्रेक्स, मैड काऊ, जैसे जैविक हथियारों का प्रयोग अन्य देशों पर दबाव डालने के लिएकर चुका है। जैसे कि पहले भी कहा जा चुका है,जो लोग कोरोना वायरस को एकजैविक हथियार मानते हैं उनके पास इस बात का भी तर्क है कि आखिर वुहान को हीक्यों चुना गया। मिस्र की वेबसाइट वेतोगन के अनुसार वुहान चीन का आठवांसबसे बड़ा औद्योगिक शहर है। आठवें स्थान पर होने के कारण चीन के अन्य बड़ेशहरों की तरह इस शहर में स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दियाजाता इसलिए इसे संक्रमण फैलाने के लिए चुना गया।

जबकि इज़राइल काकहना है कि कोरोना वायरस चीन का ही जैविक हथियार है जिसने खुद चीन को हीजला दिया। अपने इस कथन के समर्थन में इज़राइल का कहना है कि कोरोना कासंक्रमण वुहान से शुरू होना कोई इत्तेफाक नहीं है जहाँ पर वुहानइंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलोजी नामक प्रयोगशाला है जो वहाँ की सेना के साथमिलकर इस प्रकार के खतरनाक वायरस पर अनुसंधान करती है। हालांकि चीन का कहनाहै कि वुहान के पशु बाजार से इस वायरस का संक्रमण फैला है। लेकिन विभिन्नजांचों से अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि जिन साँपों और चमगादड़ों से इसवायरस के फैलने की बात की जा रही थी वो सरासर गलत है क्योंकि साँपों में यहवायरस पाया ही नहीं जाता और चमगादड़ का जब सूप बनाकर या पकाकर उसका सेवनकिया जाता है तो पकाने के दौरान अधिक तापमान में यह वायरस नष्ट हो जाता है।इस सिलसिले में अमेरिका के सीनेटर टॉम कॉटन का कहना है कि कोरोना वायरसवुहान के पशु बाजार से नहीं फैला। हम नहीं जानते कि वो कहाँ से फैला लेकिनहमें यह जानना जरूरी है कि यह कहाँ से और कैसे फैला क्योंकि वुहान के पशुबाजार के कुछ ही दूरी पर चीन का वो अनुसंधान केंद्र भी है जहां मानवसंक्रमण पर अनुसंधान होते हैं। उन्होंने अपने इस बयान के समर्थन में कहा किहालांकि उनके पास इस बात के सबूत नहीं है कि कोरोना वायरस चीन द्वाराबनाया गया जैविक हथियार है लेकिन चूंकि चीन का शुरू से ही कपट और बेईमानीका आचरण रहा है हमें चीन से साक्ष्य मांगने चाहिए। यहाँ यह जानना भी रोचकहोगा कि जब अमेरिका में चीनी राजदूत से टॉम कॉटन के बयान पर प्रतिक्रियामांगी गई तो उनका कहना था कि चीन में लोगों का मानना है कि कोरोना अमेरिकाका जैविक हथियार है। वैसे पूरी दुनिय जानती हैं कि खबरों पर चीन की कितनीसेंसरशिप और चीन से बाहर पहुँचने वाली सूचनाओं पर उसकी कितनी पकड़ है। अतःकाफी हद तक चीन के इस संदेहास्पद आचरण का इतिहास भी चीन के द्वारा ही किएजाने वाले किसी षड्यंत्र का उसी पर उल्टा पड़ जाने की बात को बल देता है।कहा जा रहा है कि चीन में कोरोना संक्रमण फैलने के कुछ सप्ताह के भीतर हीचीन के इंटरनेट पर इसे अमेरिकी षड्यंत्र बताया जाने लगा था। जानकारों काकहना है कि चीन द्वारा इस प्रकार का प्रोपोगेंडा जानकर फैलाया गया ताकि जबभविष्य में उस पर उसकी लैबोरेटरी से ही वायरस के फैलने की बात सामने आए तोयह उसकी काट बन सके। वैसे कोरोना वायरस खुद चीन की लैबोरेटरी से फैला है इसबात को बल इसलिए भी मिलता है कि जब चीन के आठ डॉक्टरों की टीम ने एक नए औरखतरनाक वायरस के फैलने को लेकर सरकार और लोगों को चेताने की कोशिश की थीतो चीनी सरकार द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया गया। कुछ समय बाद इनमें से एकडॉक्टर की इसी संक्रमण की चपेट में आकर मृत्यु हो जाने की खबर भी आई। इतनाही नहीं जब 12 दिसंबर को चीन में कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया थातो चीन ने उसे दबाने की कोशिश की। चीन की सरकारी साउथ चाइना यूनिवर्सिटी ऑफटेक्नोलॉजी के मुताबिक संभव है हुबेई प्रांत में सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोलने रोग फैलाने वाली इस बीमारी के वायरस को जन्म दिया हो। स्कॉलर बोताओ शाओऔर ली शाओ का दावा है कि इस लैब में ऐसे जानवरों को रखा गया जिनसेबीमारियां फैल सकती हैं, इनमें 605 चमगादड़ भी शामिल थे। उनके मुताबिक होसकता है कि कोरोना वायरस की शुरुआत यहीं से हुई हो। इनके रिसर्चपेपर में यह भी कहा गया कि कोरोना वायरस के लिए जिम्मेदार चमगादड़ों ने एकबार एक रिसर्चर पर हमला कर दिया और चमगादड़ का खून उसकी त्वचा में मिल गया।इन बातों से इतना तो स्पष्ट है कि कोरोना वायरस आज के वैज्ञानिक युग काबेहद गंभीर एवं दुर्भाग्यपूर्ण दुष्प्रभाव है। चाहे किसी अन्य देश ने इसजैविक हथियार का प्रयोग चीन के खिलाफ किया हो या चीन दूसरे देशों के लिएखोदे जाने वाले गड्ढे में खुद गिर गया हो घायल तो मानवता हुई है। इसीमानवता को बचाने के लिए जब विश्व युद्ध के काल में जैविक हथियारों केप्रयोग से बहुत बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों को बिना किसी कसूर के अपनेजीवन से हाथ धोना पड़ा था, तो बायोलॉजिकल वेपन कन्वेंशन की रूपरेखा तैयार कीगई। मानवता की रक्षा के लिए भविष्य में जैविक हथियारों के प्रयोग कोप्रतिबंधित करने वाला यह नियम1975 से अस्तित्व में आया। इस जैव शस्त्रअभिसमय पर 180 देशों ने हस्ताक्षर किए । इसके अनुसार इस पर हस्ताक्षरकरने वाले देश कभी भी किसी भी परिस्थिति में किसी भी प्रकार के जैविकहथियार का निर्माण उत्पादन या सरंक्षण नहीं करेंगे। लेकिन यह अभिसमय देशोंको यह अधिकार देता है कि वो अपनी रक्षा के लिए अनुसंधान कर सकते हैं दूसरेशब्दों में एक वायरस को मारने के लिए दूसरा वायरस बना सकते हैं। इसी की आड़में अमेरिका, रूस,चीन जैसे देश जैविक हथियारों पर अनुसंधान करते हैं। लेकिनकोरोना वायरस के इस ताज़ा घटनाक्रम से अब यह जरूरी हो गया है कि वैज्ञानिकविज्ञान के सहारे नए अनुसंधान करते समय मानवता के प्रति अपने कर्तव्य को भीसमझें और अपनी प्रतिभा एवं ज्ञान का उपयोग सम्पूर्ण सृष्टि के उत्थान केलिए करें उसके विनाश के लिए नहीं।

डॉ नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार है)

1 घायल तो मानवता ही हुई है#करोनावायरस