जब मैं इमरजेंसी में जेल गया तो मेरी मां मेरे साथ खड़ी रहीं!
श्री बंडारू दत्तात्रेय, माननीय राज्यपाल, हरियाणा
CHANDIGARH,25 जून, 1975 को मध्यरात्रि की घड़ी से कुछ ही मिनट पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश के लिए आंतरिक व बाहरी खतरे को बहाने से आंतरिक आपातकाल की घोषणा की गई थी। यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला दिन था। सभी शीर्ष राष्ट्रीय नेताओं - जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहार वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडीस और कई अन्य को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रेस का गला घोंट दिया गया। कोई लोकतांत्रिक अधिकार नहीं थे। आपातकाल का विरोध करने वालों के खिलाफ पुलिस ने बर्बरता की। आरएसएस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।
एक युवा आरएसएस प्रचारक के रूप में, मैं जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘‘लोक संघर्ष समिति‘‘ के बैनर तले लोगों को आपातकाल के खिलाफ लामबंद करने में सक्रिय रूप से भाग ले रहा था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में यह वास्तव में भारत का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम था। गिरफ्तारी से बचने के लिए मैं न केवल भूमिगत था बल्कि अलग-अलग हेयर स्टाइल के साथ अपनी पोशाक यानि पेंट और शर्ट में भी बदलाव किया। मैंने अपना नाम धर्मेंद्र और उपनाम मामाजी के रूप में बदल लिया था।

देश भर में लाखों लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पूरा देश एक वर्चुअल जेल बन गया था। सब कुछ संदिग्ध था। अंततः मुझे आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और मुझे चंचलगुडा केंद्रीय कारागार, हैदराबाद में रखा गया, जो आरएसएस, भारतीय जनसंघ के साथी सहयोगियों और नक्सली समूहों के सदस्यों के साथ एक वर्ष से अधिक समय तक मेरा घर था।
जेल में जीवन अलग था लेकिन काफी अनुशासित था। हम सुबह छः बजे उठते थे। यह वह समय भी था जब बैरक खोले गए थे। लगभग डेढ़ घंटे तक हम कुछ व्यायाम, योग और कुछ आसन जैसे सूर्य नमस्कार करते थे। प्रात साढे आठ बजे नाश्ते का समय था। साढे नौ बजे अन्य बंदियों के साथ कक्षाएं होती थी। क्लास के बाद हम आपस में गुप-चुप तरीके से चर्चा करते थे। इसके बाद भूगोल, समाजशास्त्र, इतिहास और राजनीति विज्ञान जैसे विभिन्न विषयों पर एक घंटे का व्याख्यान होता। सुबह ग्यारह बजे से दोपहर एक बजे तक हम जेल पुस्तकालय में उपलब्ध पुस्तकों के अध्ययन पर ध्यान केंद्रित करते थे। दोपहर एक बजे दोपहर के भोजन के बाद, हमें अपने-अपने बैरक में वापस भेज दिया जाता था।
सांय पांच बजे से छः बजे के बीच हम कुछ खेल खेलते थे, जबकि एक घंटा शाम के भजनों के लिए तय था। चूंकि अलग-अलग तरह के विचारों के बंदी थे, इसलिए हमारे बीच चर्चा का माहौल था। सांय काल लगभग साढे सात बजे, हमें रात का खाना दिया जाता था और फिर वापस बैरक में ले जाया जाता।
टाइम टेबल का सख्ती से पालन करना होता था। हमारा अपना रसोइया था। इसलिए खाना अच्छे से बना होता था। हम समय का सकारात्मक उपयोग करने में तो सक्षम थे, लेकिन आजादी नही थी। हम देश की स्थिति पर व्याकूल थे क्योंकि यह एक अभूतपूर्व स्थिति थी, जिसे राष्ट्र पर थोपा गया था।
इस बीच, एक व्यक्तिगत त्रासदी ने मुझे मारा, जब मैं जेल में था तब मेरे बड़े भाई - माणिक प्रभु - की पीलिया से मृत्यु हो गई। यह मेरे लिए, मां और परिवार के लिए एक बड़ा झटका था। जब मैं छठी कक्षा में था तब मैंने अपने पिता को पहले ही खो दिया था। मुझे अपने भाई का अंतिम संस्कार करने के लिए - दोपहर बारह बजे से रात आठ बजे तक - एस्कॉर्ट पैरोल दी गई थी। उसी रात मैं जेल में लौटा।
मुझे आज भी दर्द भरे पल याद हैं और मां ईश्वरम्मा की आंखों में आंसू आ गए। लोगों को मेरी गिरफ्तारी पर शक था। वे नहीं जानते थे कि मुझे क्यों और किन अपराधों के लिए गिरफ्तार किया गया था। मुझे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी क्योंकि लगभग 15-16 पुलिसकर्मी हमेशा मेरे आसपास रहते थे।
एक दिन मेरी माँ मुझे जेल में देखने आई। वह मेरे लिए कुछ फल लाई थी। वह यह देखकर खुश हुई कि जेल में मेरी तबीयत नहीं बिगड़ी। वास्तव में, मेरे मामा, जो स्थानीय कांग्रेस विधायक और मेयर हैदराबाद के करीबी दोस्त थे, उनको मुझसे बात करने के लिए भेजा था कि मैं एक स्वीकारोक्ति पत्र पर इस वादे के साथ हस्ताक्षर करूं कि मैं सरकार के खिलाफ भविष्य में कभी भी कार्य नहीं करूंगा। यह कहा कि हस्ताक्षर के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया जाएगा।
मेरी माँ, जो पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन चरित्र, स्वाभिमान और आत्मविश्वास से भरपूर थी, ने मामा से कहा कि क्या उसके बेटे ने कोई गलत काम किया है। उसने मामा और उसके दोस्तों से पूछा “क्या मेरे बेटे ने कोई चोरी या डकैती की है? क्या किसी लड़की के साथ भाग गया है? मेरा बेटा निर्दाेष है। ‘‘वह देश और समाज की खातिर जेल में है‘‘। हालांकि, उन्होंने मेरी मां पर मेरी राय जानने के लिए दबाव डाला। माँ ने मुझसे पूछा कि क्या पत्र पर हस्ताक्षर करने की इच्छा है।
मैंने उससे पूछा - आप क्या सुझाव देते हैं? उसने कहा कि हस्ताक्षर नहीं करना चाहिए क्योंकि ‘‘मैं कोई गलत काम करने का दोषी नहीं था‘‘। हमारी बातचीत पुलिस विभाग की स्पेशल ब्रांच के एक सदस्य की मौजूदगी में हुई. मैंने अपनी माँ से कहा “आपने सही कहा है। मैं किसी पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करूंगा।
इससे मेरी मां को बहुत खुशी हुई। मैंने देश के लिए जो किया, उस पर शायद उन्हें गर्व था। इससे मेरी मां बहुत खुश भी हुई और भावूक भी। उनके शब्दों और समर्थन ने मुझे चुनौतियों और कठिनाइयों के खिलाफ खड़े होने के लिए बहुत आत्मविश्वास दिया। परिस्थिति कैसी भी हो स्वाभिमान से समझौता नहीं करना चाहिए।
बाद में, मुझे एक महीने की लंबी पैरोल दी गई लेकिन इस शर्त के साथ कि मैं घर से कहीं बाहर नहीं जाऊंगा। सुबह दस बजे मैं अफजलगंज थाने में हर रोज रजिस्टर पर दस्तखत करने जाता था। थाने के रास्ते में एक पुस्तकालय था जहाँ मुझे पढ़ने की अनुमति थी। आपातकालीन कारावास के दर्दनाक दिनों के दौरान मेरी माँ और किताबें मेरे लिए ताकत का असली स्रोत थीं।
देश और प्रदेश के युवाओं से मेरी अपील है कि वे संवैधानिक अधिकारों और मूल्यों की रक्षा के लिए सजग रहंे ताकि संवैधानिक संस्थाएं सुरक्षित हो और उन पर तानाशाही प्रभावी न हो।