Hisar, 17.10.21-आखिरकार सोनिया गांधी ने घोषणा कर ही दी कि कौन है पूर्णकालिक अध्यक्ष और कांग्रेस को कौन चला रहा है । यह दूसरी पार्टियों से ज्यादा अपनी पार्टी के जी 23 समूह के नेताओं को बताने की जरूरत थी जो इस चेतावनी के साथ बताई गयी कि मुझसे बात करने के लिए मीडिया के पास जाने की जरूरत नहीं है । मेरे पास अपने सवाल लेकर आइए । बाहर जो भी जाना हो वह सीडब्ल्यूसी की संयुक्त बात होनी चाहिए न कि मीडिया ट्रायल । यही नहीं अब तो थोड़ा थोड़ा नवजोत सिद्धू को समझ आने लगा कि कौन है कांग्रेस हाईकमान । इस लिए इस्तीफा देने की रट कुछ कमज़ोर हुई है । वैसे हरीश रावत के पास अभी नहीं माने कि मैंने इस्तीफा वापस ले लिया है लेकिन अंदर ही अंदर वापसी को तैयार हो गये हैं । पहले तो अध्यक्ष पद पाने के लिए एक एक विधायक के घर गये जब पद मिल गया तो ऐसे ठुकरा दिया जैसा मांगा या चाहा भी न हो । चाहा तो मुख्यमंत्री पद था , मिला नहीं तो अध्यक्ष पद को थू कौड़ी कहने में देर न लगाई । जिस चन्नी की ताजपोशी करवाई उसी के विरोधी हो गये पंजाबियत के नाम पर । और अब फिर हाईआन का आग बबूला चेहरा देखा तो जैसे थे , वैसे ही राजी हो गये । पर एक बात है जब खुद नवजोत सिद्धू किसी से संतुष्ट नहीं तो फिर ये किससे संतुष्ट हो सकेंगे ? इन्हें मनाना कौन सा आसान होगा ? बेटी कहती है कि पापा सिद्धू बेचैन रहते हैं पंजाब को लेकर । वह कैसा पंजाब होगा जो सिद्धू देने की दिन रात सोचते हैं ?
अब एक और घोषणा हाईकमान ने की है और वह घोषणा है कि 14 नवम्बर से 29 नवम्बर तक आम आदमी से जुड़ी बातों के लिए विरोध प्रदर्शन वगैरह किये जायेगे । कम से कम बढ़ती महंगाई का मुद्दा तो उठाया जाये जोर शोर से । हालत यह है कि सब्जी की रेहड़ी लगाने वाला जब गली में आता है तो सब्जियों के भाव पर बात शुरू होते न होते सीधे मोदी तक पहुंच जाती है । अब यह हालत है आम आदमी की । सब्जी रेहड़ी वाले को भी रोज़ गुस्से का शिकार होना पड़ता है आम आदमी के ।
##जो दिल्ली के पास बाॅर्डर पर हुआ वह किसी भी तरह से प्रशंसनीय नहीं है । किसी को इतनी बेरहमी से मार देना जो सपने से भी बुरी मौत हो ,,,कभी पैर काट रहे हो , कभी हाथ और कभी गर्दन पर जख्म दे रहे हो । इतनी निरशंसता ? तालिबान संस्कृति ? और शर्म से सिर झुका दिया मानवता का । स्वीकार भी कर लिया अपना अपराध बड़ी निडरता से ।
###सोनीपत के निकट अपने दोस्त की बहन का सुहाग उजाड़ देने वाले को फांसी की सज़ा दी गयी है । भाई अभी फरार है । क्या ऑनर किलिंग की बजाय माफ कर देना या भूल जाना सही न होता ? अपनी ज़िंदगी से निकाल दो , दुनिया से क्यों निकालते हो ? जीने का और अपनी मर्जी से जीने का अधिकार क्यों छीनते हो ? यह खुद ही बनाये हैं ऊंच नीच और खुद ही इनमें फंस कर रह गये हम लोग ?
-पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।
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