HISAR,27.01.21-लाल किले की प्राचीन पर अपने होश ओ हबास से लेकर आज तक हर गणतंत्र दिवस पर देश के प्रधानमंत्री को तिरंगा ही लहराते देखा और फिर गर्व से सिर ऊंचा होता आया । इस बार दो माह पूर्व से चल रहे किसान आंदोलन के चलते और लगातार वार्तायें होने से एक उम्मीद बनी रही कि आखिर छब्बीस जनवरी से पहले यह ट्रैक्टर परेड रुक जायेगी और किसान सुख शांति से अपने खेतों में लहलहाती फसलों की देखरेख और अन्नदाता की भूमिका निभाने लौट जायेंगे । ये वही किसान हैं जो हर आंधी तूफान और गर्मी, सर्दी और बरसात में कभी अपने खेत नहीं छोड़ते लेकिन वही किसान दो माह से दिल्ली के बाॅर्डर पर बैठे यह सपना देखते रहे कि दिल्ली में बैठा अपने आपको एक फकीर कहने वाला उनके दुख को सुनने दौड़ा आयेगा । वह फकीर तो नहीं आया लेकिन बार बार बातचीत के न्यौता भिजवाये जाते रहे और किसान हर बातचीत में गये भी । किसान हरबार बातचीत में हार कर फिर बाॅर्डर पर बैठता रहा । फिर भी एक उम्मीद बनी रही कि ट्रैक्टर परेड से पहले कुछ न कुछ हो जायेगा ।

आजकल सोशल मीडिया पर यह लिखने का चलन हो गया है : मैं किसान हूं या आई स्पोर्ट फाॅर्मर्ज । जैसे कभी मैं चौकीदार का चलन हुआ था । पर मैं ऊपर वाले की कसम खाकर कहता हूं कि मैंने एक जमींदार परिवार में जन्म लिया और दादा व पिता जी नम्बरदार भी थे गांव के और विरासत में मुझे भी नम्बरदारी मिली और ऑफिशियल रिकाॅर्ड में आज भी मैं अपने गांव सोना का नम्बरदार हूं । पिता के निधन के बाद पच्चीस वर्ष गांव जाकर खेती तक करवाता रहा जिससे गांव और किसान की समस्याओं को निकट से देखने समझने का मौका मिला । कभी आलू के भाव इतने गिर जाते कि खेतों से मंडी तक ले जाने का खर्च भी भारी लगता और खेतों में ही खाद बनने के नाम पर सड़ने देते । हम कहते पटाखे बज रहे हैं क्योंकि धूप में आलू ऐसे हो बोलते । आंखों में आने वाले आंसुओं को रोक कर हंस कर कहते -इस साल आलू ने उल्लू बना दिया । फिर कभी शूगर मिल में पर्ची लगवाने के लिए धक्के खाते । पर्ची मिलती तो गन्ना छिलवाते । लम्बी कतार में बैलगाड़ी लगा कर रात-रात भर सर्दी में अपनी बारी का इंतज़ार करते । जीरी लगाते तो कैसे घुटनों तक पानी में उतर जाते । कोई विषैले जी जंतुओं से भी निपटना पड़ता । फिर भी कभी गन्ने तो कभी गेहूं,तो कभी आलू के हाथों उल्लू बनते रहते । किसान ने बढ़ते खर्च और कम आमदनी के चलते आत्महत्या का रास्ता चुना । नयी पीढ़ी खेती से दूर होने लगी और हमारे दोआबा के युवा विदेशों में जाने लगे । इस भ्रम में कि वहां शायद पैसों के पेड़ लगे हैं । पैसों के पेड़ किसी देश में नहीं हैं । एक ख्याल मात्र है , एक सपना भर है । इसके बावजूद खेती का धंधा ही हमारे देश का सबसे बड़ा कारोबार कहलाता है और महात्मा गांधी ने जो भी योजना देखी वह गांवों को केद्र में रख कर सोची और बनवायी । स्वदेशी का नारा भी चलता आ रहा है और हमारा देश कृषि प्रधान देश है , यह कहने की जरूरत नहीं । बच्चा बच्चा जानता है । फिर उसी किसान को दो माह से सड़कों पर आंदोलन के लिए क्यों बिठाये रखा है ? इसका समय रहते हल क्यों नहीं किया गया ? तीन कृषि कानून होल्ड करने पर तैयार हो गये पर रद्द क्यों नहीं किये ? क्या इसे राजहठ कहा जाये ? इसी जनता के बल पर आप संसद तक पहुंचे और उसी जनता की आवाज अब सुनाई क्यों नहीं देती ? फकीर हो तो भागा आना चाहिए था इतनी चीख पुकार सुन कर जो कल लाल किले तक पहुंचने का आह्वान करती रही । पहुंच भी गयी । अफसोस । आप तो तिरंगा ठहरा कर ठाठ बाठ व शान से घर चले गये और बाद में जो हुआ वह किसी भी तरह सराहनीय नहीं । एक तरफ तिरंगा फहरा रहा था तो दूसरी तरफ यही तिरंगा अचानक सतरंगी कैसे हो गया? बहुत दुखद । इस तिरंगे को फहराने के लिए कितने शहीद भगत सिंह , सुभाष चन्द्र बोस, राजगुरु, सुखदेव , उधम सिंह, बिस्मिल और न जाने कितने अनाम शहीद हो गये । जान क़ुर्बान कर गये । कोई हिसाब नहीं कि इस लाल किले पर तिरंगा फहराये जाने के लिए कितनी कुर्बानियां देनी पड़ीं ? तब कहीं देशवासियों ने लाल किले पर तिरंगा हवा में मस्त लहराते देखा ।

कल जो देखा उसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी । किसने यह पटकथा लिखी और क्यों ? आंख नम हो गयी जब सतरंगी ध्वज फहराते देखा । नहीं होना चाहिए था ऐसा । कभी नहीं । हम तो यहां विकास की ,, शौर्य की और सफलता की झांकियों के साथ उन नन्हे बच्चों को हाथियों पर आते देखते थे कि कैसे उन्होंने साहस दिखा कर और सूझ बूझ से अपने लोगों को बचाया । जो कल देखा वह बहुत दुखद है । पर सारा दोष किसान पर नहीं । इसमें दोनों पक्ष जिम्मेवार हैं और रहेंगे । यह नौबत आने ही क्यों दी गयी ? स्वर्ग में बैठे शहीद खून के आंसू बहा रहे होंगे ।

काश । तिरंगे के बराबर एक और तिरंगा ही फहराया होता तो हमारा सर
सजदे में झुक गया होता ,,,
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