MUMBAI,06.04.20-सिद्धार्थ, गौतम और बुद्ध यह नाम नही बल्कि इंसान की विभिन्न अवस्था है। राजकुमार सिद्धार्थ जहाँ सत्य से अनजान है। वास्तविकता से परे जीवन जी रहा है। एक तरफ देवदत्त उसका चचेरा उससे ईर्ष्या कर रहा है , वंही दूसरी तरफ आसित्य ऋषि आनंद मना रहे थे।
अज्ञान है तो दुख है वंही ज्ञान है तो आनंद ही आनंद है।
सिद्धार्थ का जीवन सुख सुविधा से सम्पन्न था। पिता सुयोधन ने उनके लिए चार ऋतुओ के लिए अलग अलग महल बनाये थे ताकि दुख सिद्धार्थ तक न पंहुच सके। लेकिन नियति कुछ और ही चाहती थी।
एक दिन मित्र प्रसन्न के साथ बाहर गए। और वंही उनके जीवन के दूसरे अध्याय की शुरुवात हुई।
एक बुजुर्ग, बालक और अंतयात्रा इन घटनाओ को देख कर वह चौन्क गए। साथ ही साथ उन्होंने एक सन्यासी को भी देखा।
अध्याय 2 - सत्य खोज की यात्रा
सिद्धार्थ के बाद गौतम की कहानी आती है। यह बताती है कि यंहा पर सिद्धार्थ सब कुछ छोड़ कर सत्य की खोज में निकल जाते हैं। तप, तपस्या, कर्मकांड, गुरु की खोज, भ्रमण, मनन, उपवास आदि के मार्ग द्वारा 29 वर्ष की उम्र में उन्हें आश्रम का महंत बनाने का अवसर दिया गया। लेकिन इसे भी उन्होंने अस्वीकार किया क्योंकि सत्य अभी बाकी था। सत्य से वह कोसों दूर थे।
शरीर भूखा होने पर अलग विचार आते है, शरीर का पेट भरने पर विचार बदल जाते है। उन्होंने सम्यक , मध्यम मार्ग की खोज की।
फिर वह सुनहरा दिन आया जब वह पीपल के पेड़ के नीचे बैठे।जिसे आज " बोधि वृक्ष " कहते है। पूरे संकल्प के साथ, पूरे ऊर्जा को एकत्र कर वह उस बोधि वृक्ष के नीचे बैठे। छः वर्षो के तप का फल मिलने वाला था। सभी प्रभोलन को पार कर, दुख का कवच टूटा और गौतम कंही खो गया क्योंकि बुद्ध प्रकट हो चुके थे।
कहानी का तीसरा हिस्सा- सत्य का प्रचार
बुद्ध के प्रकट होते ही सब कुछ बदल गया। उन्होंने इस यूनिवर्सल सत्य , विवेक बुद्धि, सम्यक समाधि ज्ञान का प्रचार करना शुरू किया।
उन्होंने बताया अपने अनुभव से की यह यात्रा बाहर की नही अंदर की है। सारे कर्मकांड करने के बाद उनके पास एक ही रास्ता था कि अंदर की ओर जाना। सम्यक मार्ग और संघ में रहने के लिए प्रेरित किया। माया मोहिनी से बचने के लिए, लगाव से बचने का ज्ञान दिया।
आज के लिए भी बुद्ध उतने ही प्रासंगिक है । इस लॉक डाउन में भी आप इस ज्ञान को समझ कर उसका जीवन मे उपयोग लाये। मैं जाग्रत हूँ, उसके शरण मे जाओ, अंतरात्मा से जुडो, जीवन को आनंदित बनाओ। सत्य को जानो, उसके शरण मे जाओ, संघ में रहो और अपनी अभिव्यक्ति को निखारो।
दुख ईश्वर की पुकार है जो आपको फिक्स माइंड सेट से बाहर निकाल कर ग्रोथ माइंडसेट के अनुभव पर ले जाएगा। और यह इस बुद्ध पूर्णिमा में आप भी कर सकते हो। संकल्प ले और पूरी ऊर्जा को अपने आप को जानने के लिए लगा दो।
बुद्धम शरणंम गच्छामि... सत्य को जानो उसके शरण मे आप सुरक्षित है, आनंदित है।
प्रो. डॉ. दिनेश गुप्ता- आनंदश्री
आध्यात्मिक व्याख्याता एवं माइन्डसेट गुरु
8007179747